भारत में युनानी यात्री, चीनी यात्री, अरबी यात्री

भारत में युनानी यात्री, चीनी यात्री, अरबी यात्री

विदेशी यात्री एवं लेखको के विवरण से भी भारतीय इतिहास की जानकारी मिलती है , इससे अनेक यूनानी, चीनी , अरबी आदि यात्री शामिल है ।

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वेदांग, उपवेद, पुराण, मनु स्मृति ग्रंथ और साहित्य

वेदांग, उपवेद, पुराण, मनु स्मृति ग्रंथ और साहित्य

 
Vedang, Upveda, Puran, Manu Smriti Granth and Sahitya: वेदों को समझने के लिए “वेदांगों” की रचना की गई है, और वेदांगों की संख्या 06 है ।
  1. शिक्षा 
  2. कल्प
  3. व्याकरण 
  4. निरुक्त 
  5. छंद
  6. ज्योतिष 
 

 

शिक्षा 

  • वैदिक स्वरों के शुद्ध उच्चारण के लिए शिक्षा शास्त्र की रचना की गई है ।

 

कल्प

 
  • कल्प का अर्थ कर्मकांड एवं विधि है ।
  • ये ऐसे विधिनियम है जो “सूत्र (Formula)” के रूप में लिखे गए है ।
  • कल्प सूत्र के तिन भाग है :-
  1. स्रोत सूत्र 
  2. गृह सूत्र 
  3. धर्म सूत्र 

 

स्रोत सूत्र : 

  • इसमें यज्ञ सम्बन्धित जानकारी मिलती है ।
  • स्रोत सूत्र का एक भाग ” शुल्व सूत्र” है जिसमें यज्ञ वेदी को मापने का उल्लेख है ।
  • इसी से “रेखागणित” का आरम्भ माना जाता है ।

 

गृह सूत्र : 

  • इसमें गृह कर्मकांड एवं यज्ञ का उल्लेख मिलता है ।
  • इसमें लौकिक एवं परलौकिक कर्तव्यों का विवरण भी मिलता है ।

 

धर्म सूत्र : 

  • इसमें धार्मिक, सामजिक एवं राजनितिक कर्तव्यों का उल्लेख मिलता है। 

 

व्याकरण

  • इसका अर्थ भाषा को वैज्ञानिकता प्रदान करना होता है । 
  • व्याकरण का प्राचीनतम ग्रन्थ “पाणिनि आष्टाध्यायी” है 
  • पतंजली ने “महाभाष्य” की रचना की है ।
  • कात्यायन ने ” वर्तिक” की रचना की है ।
  • पतंजली, कात्यायन एवं पाणिनि को “मुनित्रय” कहा जाता है ।

 

निरुक्त

  • निरुक्त का अर्थ “व्युत्पत्ति शास्त्र” है । 
  • शब्दों का अर्थ क्यों होता है, ये बताने वाले शास्त्र को निरुक्त कहा जाता है ।
  • यह एक प्रकार का भाषा विज्ञान है ।
  • निरुक्त में सबसे प्रसिद्ध या महत्वपूर्ण ग्रन्थ “यास्क द्वारा रचित निरुक्त” है, जिसे भाषा शास्त्र का प्रथम ग्रन्थ माना जाता है ।

 

Vedang, Upveda, Puran, Manu Smriti Granth and Sahitya 

 

Vedang, Upveda, Puran, Manu Smriti Granth and Sahitya

 

छंद 

  • पद्यों को लयबद्ध करने के लिए “छंद” की रचना की गई है । 
  • इसका प्राचीनतम ग्रन्थ “छंद शास्त्र” है जो पिंगल मुनि द्वारा रचित है ।

 

ज्योतिष 

  • ज्योतिष का विषय भविष्यवाणी है, इससे ग्रह, नक्षत्र की स्थिति तथा उनका हमारे जीवन पर पड़ने वाले प्रभाव के बारे में बताया गया है ।
  • ज्योतिष का प्रथम ग्रन्थ “वेदांग ज्योतिष” है जिसके रचनाकार आचार्य लगध मुनि है ।
  • पाणिनि ने 6 वेदांगों को शरीर के अलग अलग अंगों से तुलना की  है :-             
            वेदांग         शरीर के अंग 
  • व्याकरण          मुख
  • निरुक्त             कान 
  • ज्योतिष            नेत्र 
  • शिक्षा               नाक 
  • कल्प                हाथ 
  • छंद                  पैर 

उपवेद 

             वेद                  उपवेद
  • ऋग्वेद               आयुर्वेद 
  • सामवेद             गन्धर्ववेद
  • यजुर्वेद              धनुर्वेद 
  • अथर्वेद              शिल्प्वेद 

स्मृति ग्रन्थ 

  • स्मृतियां हिन्दू धर्म के “कानूनी ग्रन्थ” है ।
  • इन्हें प्राचीन भारतीय समाज व राज व्यवस्था के विधि पुस्तकों की संज्ञा दी जाति है ।
  • इन्हें “धर्मशास्त्र” भी कहा जाता है ।
  • कुछ प्रमुख स्मृतियां इस प्रकार है : 
  1. मनुस्मृति 
  2. याज्ञवल्क्य
  3. नारद स्मृति 
  4. पाराशर स्मृति 
  5. बृहस्पति स्मृति 
  6. कात्यायन स्मृति 
  7. देवल स्मृति 

मनुस्मृति

  • इसकी रचना “मनु” ने की है ।
  • मनु का धर्मशास्त्र हिन्दू धर्म के सम्बन्ध में एक प्रमुख प्रमाणिक ग्रन्थ है ।
  • मनुस्मृति की रचना “शुन्ग्काल” में हुई, संभवतः यह सबसे प्राचीन स्मृति है ।
  • मनुस्मृति में स्त्रियों को “वेद पढने का ” अधिकार नहीं दिया गया है ।
  • मनुस्मृति के अनुसार “स्त्रीधन” के अतिरिक्त महिलाएं संपत्ति की स्वामिनी नहीं बन सकती । 
मनुस्मृति पर निम्न विद्वानों ने टिका लिखा है : 
  1. मेघतिथि 
  2. गोविन्दराज 
  3. कुल्लुक भट्ट 
  4. भारुची 

याज्ञवल्क्य स्मृति 

  • ये मनुस्मृति की तुलना में संक्षिप्त था ।
  • ये मनु स्मृति से भिन्न था।
  • मनु ने नियोग प्रथा की निंदा की जबकि याज्ञवल्क्य ने नहीं की ।
  • मनु ने विधवाओं के उत्तराधिकार के विषय में कुछ नहीं कहा जबकि याज्ञवल्क्य ने विधवाओं को समस्त उत्तराधिकार में प्रथम स्थान दिया है  ।
 
याज्ञवल्क्य के स्मृति के टीकाकार : 
  1. विज्ञानेश्वर 
  2. विश्वरूप 
  3. अपराक  

पुराण

  • पुराण शब्द का अर्थ प्राचीन “आख्यान” है ।
  • पुराणों के संकलनकर्ता “लोमहर्ष” एवं उनका पुत्र “उग्रव्रवा” है ।
  • पुराणों की संख्या 18 है ।
  • पुराणों का अंतिम संकलन गुप्तकाल में हुआ था ।
  • पुराणों को “पंचम वेद” कहा जाता है ।
  • पुराणों में विभिन्न प्राचीन राजवंशों का भी वर्णन है ।
  • प्राचीन पुराण संभवतः “मत्स्य पुराण” है जिसमें शुंग वंश एवं सातवाहन वंश का वर्णन है ।
  • मत्स्य पुराण में सर्वप्रथम “लिंग” पूजा का उल्लेख मिलता है ।
  • विष्णु पुराण से “मौर्यों ”  के बारे में जानकारी मिलती है 
  • वायु पुराण से ” गुप्तवंशो” के बारे में जानकारी मिलती है 
  • अग्नि पुराण में “गणेश पूजा” एवं तांत्रिक पद्धति की जानकारी मिलती है ।

 

ब्राह्मनेत्तर साहित्य

  • इसके अंतर्गत मुख्यतः बौद्ध साहित्य एवं जैन साहित्य को रखा गया है ।
  • सबसे प्राचीनतम बौद्ध ग्रन्थ “त्रिपटिक” है ।
  • सुतपिटक, विनयपिटक एवं अभिधम्म पीटक बौद्ध साहित्य के ग्रन्थ है।
  • जैन साहित्य को “आगम” कहा जाता है । 

 

लौकिक साहित्य 

इसके अंतर्गत विभिन्न ऐतिहासिक रचना एवं जीवनी को सम्मिलित किया गया है , कुछ प्रमुख रचनाएं इस प्रकार है :
 
                रचना                         रचनाकार 
  • मुद्रा राक्षस                     विशाखदत्त 
  • मृच्छकटीकम                 शूद्रक 
  • अर्थशास्त्र                       कौटिल्य / चाणक्य / विष्णुगुप्त 
  • अष्टाध्यायी                      पाणिनि 
  • भधभाष्य                        पतंजली 
  • कथा सरित सागर           सोमदेव 
  • रामचरित                       सुधाकर नंदी 
  • वृहत्कथामंजरी               क्षेमेन्द्र 
  • पृथ्वीराजरासो                 चंदबरदाई 
  • पृथ्वीराज विजय              जयनक 
  • राजतरंगिनी                    कल्हभ
  • मिताक्षरा                        विज्ञानेश्वर 
  • दायभाग                         जीमूतवाहन 
  1. ऐतिहासिक रचनाओं में सर्वप्रथम उल्लेख अर्थशास्त्र का उल्लेख किया जाता है जिसकी रचना “चन्द्रगुप्त मौर्य” के प्रधानमंत्री “कौटिल्य या चाणक्य” ने की थी । जो की राजनीति से सम्बन्धित ग्रन्थ है ।
  2. ऐतिहासिक रचनाओं में एक अन्य महत्वपूर्ण रचना 12 वीं शताब्दी में लिखी गयी “कल्हभ की राजतरंगिनी” है ।
  3. गार्गी संहिता” ज्योतिष पर आधारित एक ग्रन्थ है, इस पुस्तक में भारत में होने वाले “रावण आक्रमण” का भी उल्लेख है ।
  4. 12 वीं शताब्दी में “विज्ञानेश्वर” ने “मिताक्षरा” की रचना की थी जो की एक “विधि ग्रन्थ” है । 
  5. 12 वीं शताब्दी में ही “जीमूतवाहन” ने दायभाग की रचना की थी जो एक “विधि ग्रन्थ” है, जिसमें कहा गया है की  – पिता के जन्मकाल में पुत्र को उसके संपत्ति का भाग नहीं मिल सकता किन्तु पिता के मृत्यु के बाद मिल सकता है।  
 

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